*41 डिग्री की तपिश में “जहर” पीने को मजबूर लोग*—
*घोड़ाडोंगरी तहसील में बदइंतजामी, तहसीलदार की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल*
घोड़ाडोंगरी। चिलचिलाती 41 डिग्री की गर्मी में जहां एक-एक बूंद साफ पानी जीवन बचाने का काम करती है, वहीं घोड़ाडोंगरी तहसील कार्यालय में आमजन और किसान “बीमारी का घूंट” पीने को मजबूर हैं। तहसील परिसर में बनी पेयजल टंकी की स्थिति बदहाल है—टंकी खुली पड़ी है, अंदर मच्छर, कीड़े और सड़ी गंदगी साफ दिखाई दे रही है। ऐसे में जो पानी लोगों तक पहुंच रहा है, वह सीधे-सीधे स्वास्थ्य के लिए खतरा बन चुका है।
सूत्रों के अनुसार, टंकी की लंबे समय से नियमित सफाई नहीं हुई है और न ही क्लोरीनेशन की कोई व्यवस्था दिखती है। भीषण गर्मी में जब पानी की खपत बढ़ जाती है, तब इस तरह की लापरवाही से डायरिया, उल्टी-दस्त और अन्य जलजनित बीमारियों का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। सवाल यह है कि क्या प्रशासन इस खतरे से अनजान है या जानबूझकर आंखें मूंदे बैठा है?
मामला यहीं तक सीमित नहीं है। तहसील परिसर में स्थित शौचालय की हालत भी बेहद दयनीय है—गेट टूटा हुआ, चारों तरफ गंदगी और बदबू का आलम। महिलाओं, बुजुर्गों और दूर-दराज से आने वाले किसानों के लिए यह स्थिति और भी कष्टदायक बन जाती है। घंटों इंतजार और दौड़-धूप के बीच जब उन्हें ऐसी मूलभूत सुविधाएं भी न मिलें, तो यह प्रशासनिक व्यवस्था पर बड़ा प्रश्नचिह्न है।
सबसे गंभीर बात यह है कि यह स्थिति किसी गांव या दूरस्थ क्षेत्र की नहीं, बल्कि उसी तहसील कार्यालय की है जहां से पूरे क्षेत्र का राजस्व और प्रशासनिक कामकाज संचालित होता है। ऐसे में तहसीलदार की निगरानी और जिम्मेदारी पर सीधे सवाल उठ रहे हैं। क्या नियमित निरीक्षण नहीं किए जा रहे? क्या कर्मचारियों की जवाबदेही तय नहीं है? या फिर शिकायतों को नजरअंदाज किया जा रहा है?
स्थानीय किसानों और नागरिकों में आक्रोश बढ़ता जा रहा है। उनका कहना है कि वे अपने काम के लिए रोज तहसील आते हैं, लेकिन बदले में उन्हें गंदा पानी और अस्वच्छ वातावरण ही मिलता है। “काम करवाने आएं या बीमारी लेकर जाएं?”—यह सवाल अब आम चर्चा का विषय बन चुका है।
लोगों की मांग है कि प्रशासन तत्काल प्रभाव से—
पेयजल टंकी की सफाई कर उसे ढक्कन से बंद करे
नियमित क्लोरीनेशन और निगरानी की व्यवस्था लागू करे
शौचालय की मरम्मत कर स्वच्छता सुनिश्चित करे
लापरवाही के लिए जिम्मेदार कर्मचारियों पर कार्रवाई करे
अब नजरें तहसीलदार पर टिकी हैं—क्या वे इस गंभीर मुद्दे पर तुरंत संज्ञान लेकर सुधार करेंगे, या फिर जनता को यूं ही बदहाल व्यवस्था के भरोसे छोड़ दिया जाएगा? क्योंकि यह सिर्फ सुविधा का मामला नहीं, बल्कि सीधे-सीधे लोगों के स्वास्थ्य, सम्मान और जीवन से जुड़ा सवाल है।